धूप छाँव

बेपर्दा खिड़की पाकर, बेख़ौफ़ मेरे आँगन में आती हैं

सुबह सुबह सूरज की किरणें
तमाशा बहुत दिखाती हैं,
बेपर्दा खिड़की पाकर, बेख़ौफ़,
मेरे आँगन में आती हैं।

फ़र्श पर इठलाती कहीं,
मेज़-कुर्सी का रूप बनाती हैं।
कभी, अलमारी के शीशे में अपनी
छबी देख इतराती हैं।

खाने की मेज़ की काँच पर, क्या-क्या डिज़ाइन बनाती हैं?

खाने की मेज़ के काँच पर
क्या-क्या डिज़ाइन बनाती हैं!
और सोफ़े के नीचे घुसकर
सफ़ाई याद दिलाती हैं।

अब तो ये अति हुई!
छत पर चढ़, कैसा स्वाँग रचाया है?
शायद लाइट जल रही है,
ऐसा भरम दिलाया है।

अब तो ये अति हुई! छत पर चढ़, कैसा स्वाँग रचाया है? शायद लाइट जल रही है, ऐसा भरम दिलाया है।


कुछ दिन की मनमानी ये,
कर लो तुमको जो करना है!
अभी तो सर्दी के दिन हैं,
तुमसे हमको क्या डरना है?

अच्छा लगता यह खेल तुम्हारा,
हर अदा तुम्हारी भाती है।
कुछ दिन की यह हठखेली,
जल्दी ही गरमी आती है।

धूप-छाँव की तुम कर्ता,
तुमने शायद भुलाया है।
आज अपनाया, कल बिसराया!
इस जग की ये ही माया है।

हम भी, पर्दे मोटे डालकर
तुमसे बचना चाहेंगे।
नर्म हो, तब तक अच्छी लगतीं,
वरना आँख चुराएँगे!

बेतुकबंदी, नवम्बर २०११

(This poem, about the games young rays of the sun play on an early winter morning, written in November 2011, was originally posted here in the Roman script in February 2012. I translated it into English for my son, here! With Hindi transliteration now available from my iPad keyboard, I finally got around to posting it in the Devanagari script) 

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4 thoughts on “धूप छाँव

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