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A Diwali Gift

Today, finally, I got around to opening my Diwali gift from Aditya Gupta, the Husqavarna Viking , Pfaff and Handiquilter man in India, who has become a dear friend over the years. Actually, the package had arrived more than a week ago, but I had not been able to even open it. October, so far, has been a crazy time for me, with two emergency trips to the hospital with my daughter. She is better now, thank you! 

 I had to share the pictures of this wonderfully thoughtful gift with you immediately that I saw it myself.

Husqavarna Viking Sewing Bag and Embroidery Unit bag, with strolley!


There is this bag in which I can store my Topaz 30 sewing machine when I am sewing on my Opal 690Q, or carry it along with me when travelling, for it also has a detachable telescopic strolley. The bigger bag, Aditya tells me, is for the embroidery unit; I think it may be able to fit in my quilting table as well, which is difficult to store when not in use. And don’t you just love that smart red? Here is another pic; as you can see, the machine carry bag has a sleeve which slides into the trolley and holds it there. The larger bag has a similar sleeve. 

Each bag has a sleeve at the back which holds it on the trolley.


What better gift could a sewist ask for?  

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धूप छाँव

बेपर्दा खिड़की पाकर, बेख़ौफ़ मेरे आँगन में आती हैं

सुबह सुबह सूरज की किरणें
तमाशा बहुत दिखाती हैं,
बेपर्दा खिड़की पाकर, बेख़ौफ़,
मेरे आँगन में आती हैं।

फ़र्श पर इठलाती कहीं,
मेज़-कुर्सी का रूप बनाती हैं।
कभी, अलमारी के शीशे में अपनी
छबी देख इतराती हैं।

खाने की मेज़ की काँच पर, क्या-क्या डिज़ाइन बनाती हैं?

खाने की मेज़ के काँच पर
क्या-क्या डिज़ाइन बनाती हैं!
और सोफ़े के नीचे घुसकर
सफ़ाई याद दिलाती हैं।

अब तो ये अति हुई!
छत पर चढ़, कैसा स्वाँग रचाया है?
शायद लाइट जल रही है,
ऐसा भरम दिलाया है।

अब तो ये अति हुई! छत पर चढ़, कैसा स्वाँग रचाया है? शायद लाइट जल रही है, ऐसा भरम दिलाया है।


कुछ दिन की मनमानी ये,
कर लो तुमको जो करना है!
अभी तो सर्दी के दिन हैं,
तुमसे हमको क्या डरना है?

अच्छा लगता यह खेल तुम्हारा,
हर अदा तुम्हारी भाती है।
कुछ दिन की यह हठखेली,
जल्दी ही गरमी आती है।

धूप-छाँव की तुम कर्ता,
तुमने शायद भुलाया है।
आज अपनाया, कल बिसराया!
इस जग की ये ही माया है।

हम भी, पर्दे मोटे डालकर
तुमसे बचना चाहेंगे।
नर्म हो, तब तक अच्छी लगतीं,
वरना आँख चुराएँगे!

बेतुकबंदी, नवम्बर २०११

(This poem, about the games young rays of the sun play on an early winter morning, written in November 2011, was originally posted here in the Roman script in February 2012. I translated it into English for my son, here! With Hindi transliteration now available from my iPad keyboard, I finally got around to posting it in the Devanagari script) 

ख़ुशबू पुण्डरीक की

कब से भटक रहा था मैं, ख़ुशी की तलाश में।
यह उम्र गुज़र रही थी उसे मिलने की आस में।
काशी में भी ढूँढा, घूमा कैलाश में।
राम की गलियों में, कभी कृष्ण के रास में।
न बाग़ों के गुलाब में, न जंगल के पलाश में,
यह ख़ुशबू पुण्डरीक की थी मेरे दिल के पास में।
अमृत का यह दरिया मेरे अंदर ही बह रहा था।
दर-दर क्यों गया था? सिर्फ़ पानी की की प्यास में?

न पासे की फेंक में, न तारों, न ताश में।
मेरी क़िस्मत की है चाबी मेरे इसी विश्वास में,
कि राह भी हूँ मैं और रहगुज़र भी मैं,
मंज़िल भी मैं, फिर क्यूँ फिरूँ उदास-हताश मैं?

रस्ता जो अब मिला है, इच्छा है काश में
कोई न अब कहे कि हूँ निराश मैं!
सबको शामिल कर सकूँ क़ुदरत के राज़ में,
कि ख़ुशबू पुण्डरीक की है सबके ही पास में।

कि ख़ुशबू पुण्डरीक की है
हम सबके पास में।

बेतुकबंदी  ९/९/१९९९

 

The Vacuum Cleaner

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A salesman was here today
Selling vacuum cleaners.
They clean everything,
He said.
The pelmets, the curtains,
And of course, the carpet;
Even the bedcover, the walls,
And that place under the bed
Which I can’t reach.

I wonder
If it can sweep aside
The cobwebs that blanket our lives …
… yours and mine.
Will it help me
Reach that corner
Of your heart
Which I cannot touch?
I wonder,
As I wait for you
To decide
If we need that vacuum cleaner..

                                                                                         Betukbandi  (1986)

Curtains

  
About the poet – I found this and a few other poems in the diary of an 18-year old girl a couple of years ago.  She would rather remain anonymous. Actually, she can’t remember writing them in the first place and thinks they are rather inane. So when I thought they should be recorded somewhere – whatever their worth – she reluctantly gave me  permission to share them here, albeit in my name.

About the poem – She was obviously a fan of ‘Gone With the Wind’.

About the photograph – Credit all mine! Taken on a trip to Palampur in Himachal Pradesh, India. 

यादों के पार

  
हम मिलें हैं क्या?
बंद दरवाज़ों के आर पार कभी?
एक ख़्वाब में, जो शायद 
कभी देखा ही नहीं?
या ग़ज़ल में किसी
जो अभी कहनी बाक़ी है?

उस लफ़्ज़ में जो, अनबोला,
मेरे होंठों पे बैठा है उदास
या अनपढ़ा, पड़ा 
इंतज़ार में 
इक किताब में?
हम मिलें हैं कभी?

धुएँ में उस आग के
जो सुलगी ही नहीं?
या फिर क़दमों की आहट में
जो थे, 
पर थे तो नहीं! 
शायद वहीं कहीं?

  
  


एक ख़ुशबू , जो 

मुझ तक पहुँचने से पहले
खो गयी थी कहीं।
एक नाज़ुक एहसास की गरमी
जो दिल के पास सिहरी शायद।
कहीं वहीं तो नहीं?


इक बादल था, जो अनदेखा

गुज़र गया आकाश में।
एक आह थी, 
कि कभी, कहीं, काश में …
क्या वहीं, उस उम्र में 
जो जिये ही नहीं?
यक़ीनन तो वहीं?
हम मिलें हैं क्या?

(भानगढ़, फ़रवरी २०१६)

नोट – कोई कोई स्थान ऐसे होते हैं जो दिल में हज़ार प्रश्न जगा जाते हैं! एक अजीब सा एहसास, एक बिसरी हुई याद, एक अनकही, अनजानी दास्तान…

ऐसी ही जगह है अलवर का भानगढ़, जो रातों रात ऐसा वीरान हुआ कि 250 वर्षों में फिर न बसा। आज वहाँ केवल भूत घूमते हैं !

(यह कविता अंग्रेज़ी में भी कही गयी है।)
     

Yaadon ke paar 

Hum mile hain kya?
Band darwaazon ke aar paar kabhi?
Ek khwaab mein,
Jo shaayad kabhi dekha hi nahin?
Ya ghazal mein kisi
Jo abhi kahi hi nahi? 

Us lafz mein jo unbola
Mere hothon pe baitha hai, udaas
Ya unpadha pada 
Intezaar mein
Ik kitaab mein?
Hum mile hain kabhi?

Dhuen mein us aag ke
Jo sulagi hi nahin?
Ya phir kadamon ki aahat mein
Jo the, 
Par the to nahin!
Shaayad wahin kaheen?

Ek khushboo, jo
Mujh tak pahunhne se pehle
Kho gayi thi kahin.
Ek nazuk ehsaas ki garmi,
Jo dil ke paas sihari shaayad.
Kaheen wahin to nahi?

Ik baadal jo undekha
Guzar gaya aakash mein.
Ek aah thi ki
Kabhi, kaheen kaash mein…
Kya wahin, us umra mein
Jo jiye hi nahi,
Yaqinan to waheen?
Hum mile hain kya?

(Bhangarh, February 2016)

Note: There is something hauntingly romantic about old ruins. And when these are situated in a village which is supposed to be the ‘most haunted place in India’, one’s imagination runs wild. A memory – glimpse of a veil, a whiff of a scent, a touch of the breeze – the birth of a poem, dedicated to Bhangarh, a small village in Alwar District in Rajasthan.

(I like to write my poems in Hindi as well as English, to reach out to both the audiences! )